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वंदना

यह कहां आ गये हैं हम,,,तेरी दुनिया में अब दिल लगता नहीं,,,,
दुनियां- दारी को लेकर खुश नहीं हुं मैं,,,,,

दूर तक नजर नहीं आए कोई जहां पर,,,
बस सुकून हो वहां जाना चाहता हुं मैं,,,,,

कानों में शोर मचा रहे हैं शब्द यहां के,,,,,
इन शब्दों के माईने शामिल हों जिंदगी में जहां ,,,,
वो सुनना चाहता हुं मैं,,,,,

जहां तक पढ़ा लिखा है मैंने,,,
वो बात सबसे कहना चाहता हूं मैं,,,

जिंदगी भर , कोई मतलब नहीं है बेमतलब की बातों का,,,,

एक सुन्दर सी कविता सुनाना चाहता हूं मैं,,,,

पिछले समय में लौटकर उन सपनों के हंसीन पन्नों में उतर जाना चाहता हुं मैं,,,,,,

यहां रिश्ता भी देखीं,,
यहां यारी भी देखीं, ,,,
यहां बिमारी भी देखीं और क्या क्या देखना है बाकी,,,

निकल कर संसार के झगड़ों से मैं,,,,

प्रभु जी के चरणों में बंद करके आंखों को,,,,,

सुकून से थौड़ी देर बैठना चाहता हुं मैं,,,,

हें प्रभु जी तुम्हारे चरणों में रहना चाहता हुं मैं,,,,,


अशोक सुमन

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