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छल का व्यापार

सब के सब घाव बनाने आए,
कोई औषधि भी लगाने आए।
आपसे भी न जीता गया मन,
आप भी मन को चुराने आए हैं।

विश्वास करके बैठे थे हम,
सब अपना स्वार्थ जताने आए।
हँसते हुए मिले थे जो कल तक,
आज पीठ में छुरा लगाने आए।

प्रेम के नाम पर लूटते हैं,
भावनाओं से खेल रचाने आए।
हमने तो समझा था अपनों को,
वो भी परायों का धर्म निभाने आए।

आशा के दीप जलाए थे जब,
आँधी बनकर सब बुझाने आए।
टूटे हुए मन को जोड़ने की,
आस में थे, वो भी गिराने आए।

फिर भी ‘अमन’ तुम हँसते रहना,
पीड़ा को गीत बनाने आए।
घाव देने वाले भूल जाएँगे,
हम कविता में अमर हो जाने आए।

अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला ‘अमन’ सनातनी
सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)

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