
दूर से देखा, दूर से देखा तो भैंस पूँछ हिला रही थी
पास जाकर देखा तो मेरी घरवाली बाल सुखा रही थी
और अपने नाज़-नखरे दिखा रही थी
मेरे बचपन में जोर से बिजली कड़कती
और जवानी में मेरी घरवाली भड़कती
और क्या लिखूँ मैं अपनी कहानी
मैं भरता उसके आगे पानी
यह कविता है मेरे घर-परिवार की परिभाषा
मेरी घरवाली है मेरे गाँव में आशा
देखा है मैंने त्रिया चरित्र का खेल
मेरे घर में है ऊँट-बैल
जानवरों से भरा पड़ा है मेरा घर-परिवार
बस करते हैं सब के सब अपने अपने हिसाब से प्यार
मैंने देखा है होता है रिश्तों में व्यापार
मेरी घरवाली के जरा हटके हैं संस्कार
कवि:- गोपाल जाटव विद्रोही खड़ावदा तह गरोठ जिला मन्दसौर मध्यप्रदेश
मोबा.. 9770370192 & 9165002920
दि. 27/6/26
सर्वाधिकार सुरक्षित
यह अप्रकाशित कविता है













