
विषय – यशोधरा का विरह
तुम तो पा लोगे उजाला, पर मेरे दुःख का क्या होगा?
जो बुझा गए तुम दीपक, उस अंधेरे का क्या होगा?
तुम चले गए चुपके से, मुझे ज़िंदा लाश बनाकर,
इस तड़पते हुए दिल के, हर सवेरे का क्या होगा?
सोया था राहुल गोदी में, तुम देख के भी न पसीजे,
क्या एक बार भी दिल न धड़का,पीछे कदम न खींचे?
मैं सोती रही बेख़बर यहाँ, तुम पाँव दबाते निकल गए,
पत्थर की मूरत बन बैठे, जो पल में ऐसे बदल गए।
अब श्रृंगार ज़हर सा लगता है, ये कंगन चुभते बाहों में,
मैं ढूँढ रही हूँ धूल तेरी, इन सूनी-सूनी राहों में।
तुम बुद्ध बनो, भगवान बनो, जग पूजेगा स्वामी,
पर हार गई यशोधरा आज, रोती है खड़ी अंतर्यामी।
सूनी पड़ी सेज पर बिखरे, उन सपनों का क्या होगा?
लौट कर घर आओगे, इस उजड़े चमन का क्या होगा?
तुम तो पा लोगे उजाला,पर मेरे दुःख का क्या होगा?
जो बुझा गए तुम दीपक, उस अंधेरे का क्या होगा?
रीना पटले शिक्षिका
जिला-सिवनी मध्यप्रदेश













