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आत्मीयता

सुहृदय जन सभी को मान लेते हैं स्वजन
इस जग में जब तक मतलब
तभी तक चेहरे पर भाव रहें …
सुहृय जन थे अपने…. नहीं थे वो देवता से कम।
लक्ष्य की पूर्ति हुई
पकड़ी राह अपनी … थे वो हिय समाए स्वजन
खो गए दुनिया की भीड़ में… तब ठगा सा रह जाए तब
सुहृय जन।

स्वजन का क्या बना होगा…
न वो फोन पर बतलावें
अगर या सताए उनकी– स्वयं ही– बात करें आगे बढ़ के
उत्तर मिले… नहीं है अभी फुर्सत… फिर बात करेंगे हम
कभी था वक्त पांव पड़े …
राह दिखाने वाले थे तब थे वे गुरुजन ।

कभी भविष्य में काम पड़ेगा
फिर चोखट पर दस्तक देंगे…
कहें–हमें भूल गए क्या ! … आप हिय हमारे हरदम …
आप हमारे गुरुजन
हृदय निश्छल-सा कोमल जिनका का अन्तर्मन
आवभगत करें उनकी …
हाथ जोड़े समक्ष खड़े थे वो पुराने स्वजन
पूरे मनोभाव से काम आंए फिर से ….नि: स्वार्थ जिन के अंतर्मन ।

ये दुनिया स्वार्थमय हो चली
मिट गए मूल्य … क्यों व्यथित तुम्हारा मन
भावनाएं क्षणभंगुर हुई … ज्यूं सागर लहर उठी
आंखों से ओझल हुई… कहां ढूंढ़ोगे तत्क्षण
जीवन जीने की परिभाषा बदल गई
कहां सोए हो … हे सुहृद जन !

      महेश शर्मा, करनाल

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