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लघुकथा


लोकोक्ति- आम के आम, गुठली के दाम
कोरोना काल में अचानक लगे लॉकडाउन ने अनेक लोगों की आजीविका छीन ली। सुरेश भी उनमें से एक था। जिस कंपनी में वह काम करता था, वहाँ से उसकी नौकरी चली गई। भविष्य की चिंता में वह दिन-रात परेशान रहने लगा।
एक दिन उसकी माँ ने उसे उदास बैठे देखा। उन्होंने स्नेह से कहा, “बेटा, कठिन समय में निराश होने से रास्ते नहीं खुलते। हार मत मानो। अपनी मेहनत और हुनर पर भरोसा रखो।”
माँ के शब्दों ने सुरेश में नया उत्साह भर दिया। घर में बने स्वादिष्ट मसाले और अचार की सब प्रशंसा करते थे। माँ ने सुझाव दिया कि इन्हें ऑनलाइन बेचना शुरू किया जाए। सुरेश ने थोड़ी-सी बचत से पैकिंग का सामान खरीदा और सोशल मीडिया के माध्यम से उत्पादों का प्रचार शुरू कर दिया।
धीरे-धीरे ऑर्डर आने लगे। ग्राहकों को घर का शुद्ध स्वाद पसंद आया। कुछ ही महीनों में उसका छोटा-सा काम अच्छी आय देने लगा। उसने मसालों के साथ पापड़ और मुरब्बे भी बेचने शुरू कर दिए। व्यवसाय लगातार बढ़ता गया।
आज सुरेश कई लोगों को रोजगार दे रहा है। वह अक्सर कहता है, “यदि माँ ने उस समय हिम्मत न बँधाई होती, तो मैं शायद निराशा में ही डूबा रहता।”
सुरेश की सफलता यह सिद्ध करती है कि विपत्ति में धैर्य, परिश्रम और सही मार्गदर्शन मिल जाए तो छोटी-सी शुरुआत भी बड़ी उपलब्धि में बदल सकती है। सच ही है—”आम के आम, गुठलियों के दाम।”
शिक्षा: कठिन परिस्थितियाँ अंत नहीं होतीं; वे नए अवसरों की शुरुआत भी बन सकती हैं।


डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार

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