
गाँव में जन्मा हूँ और गाँव में ही मर जाउंगा इसके शिवा हे साहेब मैं कहाँ जाउंगा
गाँव का वासी हूँ और गाँव में ही आउंगा इससे ज्यादा हे साहेब क्या मैं बताउँगा
बस कुछ पल के लिए निकला हूँ मैं अपने घर और गाँव से इस पापी पेट के खातिर
क्योंकि कुछ जिम्मेदारी है साहेब बीवी बच्चों का मैं निकला हूँ बस उनके खातिर
मुझे कोई शौक नही है साहेब घर से बाहर रहने का बस कुछ जरूरत है उनके खातिर
जब तक जरूरत पूरी नहीं होती है साहेब तब तक हमें तो घर से बाहर ही रहना है
ये मैं नहीं कहता हूँ साहेब ये उन इंसान का कहना है जो अपने घर से बाहर रहतें हैं
बस इतनी सी बात है साहेब जानते तो हम सब है लेकिन मानते कोई नहीं है
क्योंकि अपने बिहार में हे साहेब रोजगार का कोई सिस्टम्स नहीं है
पलायन रूकेगा तो कैसे रूकेगा साहेब जब तक हम गरीब को रोजगार नहीं मिलेगा
चन्दे पासवान उर्फ अलबेला जी मधुबनी बिहार से,













