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प्रेम, दया, आशीर्वाद गिनते रहिये

बीत गया जो, बदला कैसे जायेगा,
मंतव्य वास्तविकता कैसे बतलाएगा,
मंज़िल अलग, गंतव्य एक होता है,
बीती बिगड़ी बातें भी बनते देखा है।

सकारात्मक सोच सदा सदैव,
हमें सकारात्मकता ही देती है,
जो चीज़ किसी और को देते हैं,
वही हम तक लौट फिर आती है।

हार मान कर संघर्षों से बैठ जाओगे
तो जीवन में असफलता ही पाओगे,
आचार विचार व सदव्यवहार से
अपना सच्चरित्र दिखला पाओगे।

ज़्यादा सोच विचार जीवन में
दुःख और कष्ट ही देने लगता है,
दया धर्म निशुल्क होते हैं, इन्हें
अपनाने में कुछ नहीं लगता है।

प्रसन्नता का कहीं और नहीं हमारे
खुद के अंतर्मन में ही स्थान होता है,
सिद्ध करना नहीं बल्कि अच्छा इंसान
बन जाना अधिक महत्वपूर्ण होता है।

अच्छे सम्बन्ध निभाने में मात्र वक्त
की ही नहीं समझ भी ज़रूरी होती है,
हाथों से वह नहीं दिया जा सकता है,
वो दुआ हृदय से भी दी जा सकती है।

जिरह द्वन्द्व में लड़ते लड़ते हम सब
का पूरा जीवन कम पड़ जाता है,
प्रेम, दया व आशीर्वाद गिनते रहिये
आदित्य जीवन सुखमय हो जाता है।

डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र, ‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ

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