
माँ,
तेरे आँचल की छाँव जैसी
इस धरती पर और कहाँ मिलती है,
तू खुद धूप में जलती रहती,
पर सबको ठंडी छाया देती है।
जब मैं छोटा था,
तूने अपनी नींदें बेचकर
मेरे सपनों को सींचा था,
ठीक वैसे ही जैसे एक वृक्ष
अपनी जड़ों से जीवन खींचकर
फल-फूल सबको देता है।
माँ, तू भी तो एक वृक्ष है—
त्याग की मिट्टी में पली,
ममता की शाखाओं से भरी,
प्रेम के फल बाँटती हुई,
दुख की आँधियों में भी
अडिग खड़ी रहती है।
आज तेरे नाम एक पौधा रोपता हूँ,
ताकि आने वाली पीढ़ियाँ जान सकें,
कि माँ केवल एक रिश्ता नहीं,
जीवन का सबसे पावन उपहार है।
जब यह पौधा वृक्ष बनेगा,
इसकी हर पत्ती तेरी दुआ गाएगी,
हर शाखा तेरे त्याग की कथा सुनाएगी,
और इसकी छाया में बैठकर
कोई न कोई माँ को याद करेगा।
आओ, इस धरा को हराभरा करें,
माँ के प्रेम का सम्मान करें,
एक वृक्ष लगाएँ माँ के नाम,
और प्रकृति को प्रणाम करें।
माँ जीवन है, माँ आधार है,
माँ ही तो सृष्टि का पहला प्यार है।
एक वृक्ष माँ के नाम लगाएँ हम,
यही माँ के चरणों में सच्चा उपहार है।
प्रोफेसर सुषमा देवी
संस्कृत विभाग जम्मू विश्वविद्यालय, जम्मू













