
ज़िंदगी अब भी वैसी ही है, जैसी पहले थी, बस थोड़ा-सा वक़्त बदला है, और थोड़ा-सा मैं।
पहले अकेला था, बेफिक्र था, जहाँ मन किया वहीं फैल जाता था।
जूते कहीं, मोज़े कहीं, कपड़े कहीं, और मैं बेपरवाह कहीं।
घर का मालिक कहलाता था, अब घर का सबसे प्यारा “नौकर” हूँ। हालात बस इतने ही बदले हैं, कि पहले से थोड़ा नहीं, काफ़ी ज़्यादा सुधर गया हूँ।
पहले माँ डाँटा करती थीं, अब बीवी प्यार से सुनाती है। सुबह की शुरुआत भी उसी से होती है, और शाम तक उसकी मीठी-सी भुनभुनाहट चलती रहती है। पता नहीं इतनी बातें वो कहाँ से ले आती है।लेकिन सच कहूँ, अब उसकी आदत-सी पड़ गई है। एक पल भी वो नज़र से ओझल हो जाए, तो दिल में एक अजीब-सी बेचैनी दौड़ जाती है।
पहले ज़िंदगी सिर्फ़ मेरी थी, अब मेरी हर खुशी, हर दुआ, हर मुस्कान उसी से जुड़ी है।
अब वही मेरी दुनिया है, वही मेरा सुकून, वही मेरी मंज़िल।
ज़िंदगी अब उसी से शुरू होती है, और उसी पर आकर ठहर जाती है।
आर एस लॉस्टम













