
मुझे मिला है चम्बल नदी का किनारा,
भगवान शंकर का सहारा,
लहरें करती जलाभिषेक,
भोले का ये द्वार है प्यारा।
चम्बल मैया की गोद में,
शिव का डेरा न्यारा।
डमरू की गूँज से काँपे काल,
त्रिशूल थामे खड़े महाकाल,
जो अन्याय से टकराए,
शिव बन जाएं उसकी ढाल।
भगवान शंकर का मिलता रहे,
मुझ कलमकार को आशीर्वाद,
शब्द-शब्द में बसे भोलेनाथ,
हर अक्षर में भरा सिंहनाद।
अपनी कलम से उगलने वाले,
शब्दों को मानो प्रसाद,
भाव की स्याही से लिखता हूँ,
शिव चरणों में साष्टांग दंडवत।
महामृत्युंजय मंत्र का करो जाप,
मन का मिटे संताप,
रण में भी अडिग रहे जो,
बढ़े उसका पुण्य और प्रताप।
मैं खड़ावदा का एक कलमकार,
गोपाल जाटव विद्रोही,
चम्बल मैया की माटी का जाया,
शिव ने थमाई है ये लेखनी,
रग-रग में भर दी रुद्र की माया।
जब-जब टूटे मन के तार,
शिव ने भरी हर बार हुंकार,
कवि और शिव का रिश्ता ये,
जैसे खांडा और धार।
न डरूँ मैं काल के वार से,
तीसरा नेत्र खुले जिस बार पे,
महाकाल खड़े मेरे द्वार पे,
झुके यम भी जिसके भार से।
कविता नहीं ये रणभेरी है,
लिख दी भोले के प्यार में,
शब्दों में शंखनाद भर दिया,
हर बाधा को ललकार में।
गोपाल जाटव विद्रोही_
खड़ावदा, तहसील गरोठ, जिला मन्दसौर, मध्यप्रदेश













