
प्रसाद के स्वर में गूँज रहा, भारत का गौरव-गान,
राष्ट्रप्रेम की अमर ज्योति से, आलोकित था हिंदुस्तान।
अतीत की गौरवशाली गाथा, फिर से उन्होंने गाई,
वीरों के बलिदानों की छवि, जन-जन के मन में समाई।
हिमालय-सा ऊँचा स्वाभिमान, गंगा-सी पावन धारा,
उनके काव्य में बसता दिखता, भारत का उजियारा।
संस्कृति की पावन विरासत का, उन्होंने मान बढ़ाया,
भाषा, धर्म और मानवीयता का, सच्चा पथ अपनाया।
‘कामायनी’ का गूढ़ संदेश, मानवता का सार,
‘स्कन्दगुप्त’ और ‘चंद्रगुप्त’ में, राष्ट्रभक्ति का विस्तार।
सोए हुए स्वाभिमान को, फिर से उन्होंने जगाया,
भारत की सांस्कृतिक अस्मिता का, जग में मान बढ़ाया।
ऐसे युगद्रष्टा कवि प्रसाद को, शत-शत नमन हमारा,
उनका काव्य रहेगा अमर, जब तक जग में भारत प्यारा।













