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साहित्यकार, लेखक, कवि, राजनीतिज्ञ, शिक्षाविद्, राष्ट्रीय प्रवक्ता और समाजशास्त्री डॉ. ओम सिंह शेखावत “अनन्य” द्वारा प्रस्तुत कहानी।

कहानी का शीर्षक: “अनन्य का गुप्त दान: रेखा की उड़ान”

एक छोटे से गाँव में रेखा नाम की एक गरीब बच्ची रहती थी। घर की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि कई बार किताबों से पहले रोटी की चिंता करनी पड़ती थी। लेकिन कहते हैं, “जहाँ चाह, वहाँ राह।” रेखा पढ़ाई में इतनी होशियार थी कि गाँव के मास्टरजी भी कहते थे, “अगर इस बेटी को अवसर मिल जाए, तो यह एक दिन बड़ा अधिकारी बन सकती है।”

पर हर कहानी में कुछ किरदार ऐसे भी होते हैं जिन्हें दूसरों की तरक्की रास नहीं आती। रेखा का चाचा और ताऊ हमेशा उसे पढ़ाई छोड़ने के लिए कहते।

चाचा हँसते हुए कहता, “इतनी पढ़ाई करके क्या कलेक्टर बनेगी?”

ताऊ तुरंत जोड़ देता, “बेटियों की किताबें नहीं, रसोई चमकनी चाहिए।”

गाँव का स्वयंभू पटेल पालीवाल भी उन्हीं की हाँ में हाँ मिलाता। गाँव में लोग उसे मज़ाक में “चलता-फिरता मदारी” कहते थे, क्योंकि वह हर बात का ऐसा तमाशा बना देता कि लोग असली मुद्दा भूल जाते।

कहावत है, “खाली बर्तन ज़्यादा बजते हैं।” यही हाल उन तीनों का था। बातें बड़ी-बड़ी, काम एक भी नहीं।

उधर रेखा चुपचाप अपनी मेहनत करती रही। उसे विश्वास था कि “मेहनत कभी धोखा नहीं देती, बस परीक्षा ज़रूर लेती है।”

इसी बीच एक दिन गाँव में एक समझदार और सरल स्वभाव के व्यक्ति अनन्य का आगमन हुआ। वह कवि भी था और समाजसेवी भी। उसने रेखा की प्रतिभा देखी। उसने न कोई मंच सजाया, न अखबारों में फोटो छपवाई, न ही अपने दान का ढिंढोरा पीटा।

वह मुस्कुराकर बोला, “बेटी, पढ़ाई मत छोड़ना।”

रेखा ने पूछा, “लेकिन मेरी फीस…?”

अनन्य ने कहा, “तुम बस पढ़ो। बाकी चिंता मुझे करने दो।”

उसने चुपचाप रेखा की पढ़ाई, किताबों और रहने की व्यवस्था कर दी। किसी को पता भी नहीं चला कि यह सहायता कौन कर रहा है।

अनन्य अक्सर कहता था, “भगवद्गीता का संदेश है—कर्म करो, फल की चिंता मत करो।”

और वह सचमुच उसी पर चलता था।

गाँव के लोग पूछते, “इतना सब कर रहे हो, नाम तो बताओ।”

अनन्य हँसकर कहता, “गुप्त दान ही महादान है। जहाँ नाम की इच्छा आ जाए, वहाँ दान छोटा पड़ जाता है।”

समय बीतता गया। रेखा ने कठिन परिश्रम किया। प्रतियोगी परीक्षा उत्तीर्ण की और एक प्रतिष्ठित अधिकारी बन गई।

जिस दिन वह अधिकारी बनकर गाँव लौटी, पूरा गाँव स्वागत के लिए खड़ा था।

चाचा और ताऊ, जो कभी कहते थे “कुछ नहीं होगा”, अब सबसे आगे माला लेकर खड़े थे।

पालीवाल भी बोला, “बेटी, हमें तुम पर गर्व है।”

रेखा मुस्कुराई और बोली, “गर्व आज नहीं, उस दिन करना चाहिए था जब मुझे पढ़ने की ज़रूरत थी।”

पूरा गाँव शांत हो गया।

तभी अनन्य ने धीमे से कहा, “पेड़ फल लगने पर झुकता है, और इंसान बड़ा बनने पर विनम्र होता है।”

रेखा ने सबके सामने कहा, “आज मैं जिस स्थान पर हूँ, वह किसी चमत्कार से नहीं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के कारण हूँ जिसने बिना नाम चाहे, बिना सम्मान माँगे, मुझे आगे बढ़ने का अवसर दिया।”

फिर उसने गाँव की गरीब बेटियों की पढ़ाई के लिए एक शिक्षा निधि की स्थापना की और कहा, “जिस प्रकार मुझे सहारा मिला, उसी प्रकार अब हर बेटी को सहारा मिलेगा।”

उस दिन गाँव ने समझा कि कन्यादान केवल विवाह में बेटी को विदा करना ही नहीं, बल्कि उसकी शिक्षा, उसके सपनों और उसके आत्मसम्मान को संवारना भी एक महान दान है।

कहावतें सच साबित हो गईं—

नेकी कर, दरिया में डाल।
जहाँ चाह, वहाँ राह।
मेहनत का फल मीठा होता है।
कर्म ही पूजा है।
विद्या सबसे बड़ा धन है, जिसे कोई चुरा नहीं सकता।
संदेश:
सच्चा समझदार वही है जो बिना प्रसिद्धि की इच्छा के किसी योग्य व्यक्ति की सहायता करे। गुप्त दान, शिक्षा का दान और बेटियों को आगे बढ़ाने का संकल्प समाज का सबसे बड़ा निवेश है। कर्म करते रहिए, क्योंकि अच्छे कर्मों का फल केवल व्यक्ति को नहीं, पूरे समाज को ऊँचा उठाता है।

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