
एक वक्त के बाद सब ठहर सा जाता है!
शब्द फुसफुसाहट से रह जाते है और आवाज मौन की चीख़-पुकार।।
फुसफुसाहट लोगो को अपनी ही सुनाई नही देती
किताबों की क्या खाक सुनाई देगी।।
दुनियाँ जो आभासी थी अब साफ दिखाई नही देती ।।
चीख किताबो की क्या ही सुनाई देगी।।
हाँ मर चुकी हैं संवेदनाएँ अब सच मानो मौत मे भी रूलाई दिखाई नही देती।।
बदल गया है वक्त कमबख्त यह शोरगुल की दुनियाँ मे बेचारी किताबें मौन दिखाई ही नही देती।।
वर्चुअल। सब एकच्युल सच कहूँ तो रियलिटी दिखाई ही नही देती।।
आप कौन जानकर भी तो मौन सच मे असलियत अब दिखाई ही नही देती।।
इतना शोर कि घनघोर और तुम कहते फुसफुसाहट!!
जी जनाब नही सच मे सुनाई नही देती।।
संदीप शर्मा सरल।।
देहरादून उत्तराखंड ।।













