
हस्ती कुछ ऐसी हमारी मिटाये मिटती नही
लाख सितम तेरे हो मेरे रब निगाहें हमारी झुकती नहीं
सितम है कि पल पल की निशानी है
सुकून सिर्फ किताबों की कहानी है
दर्द भरपूर दिया तुने ए रब सिसकने का मौका भी ना दिया
रहती ज़िंदगी मे तसल्ली का खाली शब्द भी सुनाई ना दिया
ज़िंदगी नही हमे सजा मिली थी
दुनियाँ मे बेवजह आने की एक वजह मिली थी
गिला किसी से कुछ नही खुदी की ये लड़ाई है
गुनाह खता क्या होंगी सामने डटी खुदाई है
जिंदगी का नासुर ये सफर है गुजारना है
साँसों का मुकम्मल ये इम्तिहान है रोकना नही सँवारना है
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र













