ये मोहब्बत भी एक अजब रसूल है
किसी के वास्ते हम मरे तो कोई हमारे वास्ते मरा
गर मोहब्बत मरने का ही एक नाम है
क्यों हम मरे क्यों वो मरा
मिलन गर नसीब ना था तड़फ क्यों मिली
समझौता इश्क मे ही क्यों हुआ
जी ना वो रहे है ना हम जी रहे है
रिवाज़ जीने का समय के साथ बस हम ही निभा रहे है
सुकून दिल का दिल मे ही दफन हो गया
अरमान उसे पाने का जाने कहाँ खो गया
जिसे मकसद बनाया वो मकसद ही एक दिवा स्वप्न बन गया
ये इश्क कितना कठौर है एक साथ कई ज़िंदगी तबाह कर गया
दिल ही दिल मे बस इख्तियार हो गया
एक दूजे की नज़रों मे ही प्यार हो गया
इकरार ना वो कर पाये ना इज़हार हम कर पाये
कब ज़िंदगी बिखर गयी ना हम जान पाये ना वो जान पाये
भावनाओं से महरूम एक रास्ता तय कर रहे है
जालिम इस दुनियां मे मुकाम अपना तलाश रहे है
नसीब मे अपने हुमनशीं ना था देर बहुत लगी जानने मे
जीवन मे थी बहुत् पेचीदगी एक ज़िंदगी लग गयी इसे पहचानने मे
मुकाम है कि बस अब मौत ही अपनी नज़र आती है
ज़िंदगी तो बेवफा है हर पल ही बस रुलाती है
उसूल-ए-ज़िंदगी है यारों पाक मोहब्बत एक गुनाह है
इश्क के ज़ुर्म मे भी महरूम खुदा की पनाह है
एक ऐसा दर्द है ताजिंदगी ही सहना है
बस यादें उनकी अपना रकीब समझ जीना है।
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र













