
अब भी मुझे काँटे पसंद हैं,
चाहे जितने भी कटीले हों,
कितना भी दर्द दें,
फिर भी मुझे काँटे ही पसंद हैं।
फूल तो खिलते हैं,
कुछ पल मुस्कुराते हैं,
फिर मुरझा जाते हैं।
कभी भँवरा उनका रस चूस जाता है,
कभी कोई मनचला उन्हें तोड़ ले जाता है,
कभी मंदिर में चढ़ा दिए जाते हैं,
तो कभी किसी के पैरों तले
बेरहमी से कुचल दिए जाते हैं।
मगर काँटों का क्या?
न कोई उन्हें तोड़ सकता है,
न कोई उन्हें आसानी से छू सकता है,
न कोई उन्हें पैरों तले
कुचल सकता है।
क्योंकि काँटे जानते हैं
खूबसूरत दिखना जरूरी नहीं,
अपने अस्तित्व के लिए मजबूत होना जरूरी है।
फूलों की तरह
हर किसी को खुश करना मेरी फितरत नहीं,
काँटों की तरह
अपनी हद में रहकर
खुद की हिफाज़त करना मुझे आता है।
इसीलिए…
हाँ, अब भी मुझे काँटे पसंद हैं।
आर. एस. लॉस्टम












