
विनम्रता शब्द सामान्य शब्द नहीं , सामर्थ्यवान शब्द है । क्योंकि विनम्रता शब्द मानव के लिए बना है और वास्तव में मानव वही होता है , जिसमें मानवता हो तथा उस मानवता शब्द को निखारने वाला शब्द विनम्रता होती है , जो उस मानव को सर्वोच्च शिखर पर पहुॅंचा कर ही दम लेता है ।
यह स्वाभाविक होता है कि जहाॅं मानवता हो वहीं विनम्रता होती है , जहाॅं विनम्रता हो , वहीं मृदुलता होती है , जहाॅं मृदुलता हो वहीं शिष्टता होती है और जहाॅं शिष्टता होगी वहीं सरस व्यवहार, आदर , सत्कार भी परिपूर्ण होते हैं । इसीलिए कहा भी संस्कृत में गया है कि ' विद्या ददाति विनयं , विनयं ददाति पात्रताम् ' ।
शायद यही कारण है कि भगवान राम को ' मर्यादा पुरुषोत्तम ' की उपाधि मिली थी , क्योंकि नम्र होना मानवता का लक्षण है किंतु विनम्र उसे कहते हैं जो विशेष नम्र हो और यह विशेष नम्र ही विश्वास प्रदान करता है , जिससे मानव ' महान ', ' महामानव ', और ' भगवान ' की उपाधि प्राप्त कर लेता है और वही मानव जन जन के ऑंखों का तारा बनकर उसके हथेली पर वास करता है । शायद इसीलिए कहते हैं ' दुल्हन वही जो पिया मन भाए ' ।
यों तो हर कोई कहते हैं कि मैं विनम्र हूॅं । वास्तव में नम्रता का तो अधिकतर जनों में वास है , किंतु विनम्रता विरले ही पाए जाते हैं । विनम्रता और विश्वास के कारण ही भक्त प्रह्लाद में नारायण के प्रति भक्ति उत्पन्न हुई थी और नारायण ने अंततः हिरण्यकश्यप से रक्षा की थी और प्रह्लाद को मोक्ष प्राप्त हुआ था ।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।












