
— नेपाल त्रासदी पर एक संवेदनशील काव्य रचना
नेपाल लिखूँ… या बेहाल लिखूँ,
त्योहारों के इस मौसम में
मैं कैसे मन को खुशहाल लिखूँ?
इधर दीपों की कतारें हैं,
उधर बुझते हुए घर हैं,
इधर मंगलगीतों की गूँज है,
उधर सिसकियों के स्वर हैं।
इधर थालियों में पकवान सजे हे,
वहां आँखों में पानी है,
किसी आँगन में उत्सव है,
किसी घर में वीरानी है।
नेपाल लिखूँ… या बेहाल लिखूँ,
मैं किसको आज सवाल लिखूँ?
पड़ोस में प्रकृति जब रूठी,
तो कैसे अपना त्योहार लिखूँ?
पल भर में जो बस्तियाँ उजड़ीं,
पल भर में जो सपने टूटे,
जिन हाथों ने कल घर बनाए थे,
आज वही हाथ अपनों को ढूँढ़े।
नदियों ने जब रौद्र रूप धर,
किनारों की हद तोड़ी,
कुदरत के उस एक प्रहार ने
कितनी साँसों की डोर छोड़ी।
पहाड़ों की छाती घायल है,
धरती का आँचल भीगा है,
हर राह पर प्रश्न खड़ा है —
“आख़िर मेरा अपना कहाँ है?”
मैं कैसे उन आँखों को भूलूँ,
जिनमें अपनों की आस जगी है?
मैं कैसे उन माताओं से कह दूँ—
“देखो, दुनिया त्योहार मना रही है।”
नहीं…!
आज मेरी ख़ुशी अधूरी है,
आज मेरी हँसी भी ठहरी है,
जब तक पड़ोसी की आँख में आँसू हैं,
मेरी आँखोमें कहाँ सचमुच हँसी है?
नेपाल केवल देश का नाम नहीं,
नेपाल तो पड़ोसी का घर है;
उसकी पीड़ा में हमारी पीड़ा,
उसका दर्द हमारे दिल का स्वर है।
सीमा की रेखाएँ बाँट सकीं
धरती के काग़ज़ पर देश,
लेकिन बाँट नहीं सकतीं
इंसान के दिल का परिवेश।
आज न कोई हिंदू-मुसलमान,
न कोई जाति, न कोई मज़हब,
आज बस एक इंसान खड़ा है
दूसरे इंसान के साथ हरदम।
जिस घर का चूल्हा बुझा हुआ है,
वहाँ उम्मीद की लौ जलाएँ,
जो बिछड़ गए हैं अपनों से,
उनके लिए दुआएँ सजाएँ।
आओ, आज उत्सव थोड़ा कम,
और संवेदना कुछ अधिक करें;
किसी के अँधियारे जीवन में
हम उम्मीद का दीप धरें।
कुदरत का प्रहार बड़ा होगा,
पर मानवता उससे बड़ी हो,
टूटे हुए हर दिल के भीतर
फिर से जीने की आस खड़ी हो।
मैं नेपाल लिखूँ या बेहाल लिखूँ?
अब जाकर समझ में आया क्या लिखना है—
नेपाल की पीड़ा के आगे
इंसानियत का सवाल लिखना है।
मैं मातम की रात नहीं लिखूँ,
मैं उम्मीद की सुबह लिखूँ,
जो राख हुई उन बस्तियों में
फिर खिलता हुआ गुलाब लिखूँ।
मैं आँसुओं का हिसाब नहीं,
मदद के बढ़ते हाथ लिखूँ,
टूटे हुए हर आशियाने में
फिर लौटती हुई बात लिखूँ।
और अंत में बस इतना लिखूँ—
नेपाल अकेला नहीं है,
उसके साथ पूरा हिंदुस्तान है;
दर्द की इस घड़ी में पड़ोसी के लिए
हर भारतीय का दिल मेहरबान है।
तो आज न केवल
“नेपाल” लिखूँ…
न केवल उसका “बेहाल” लिखूँ…
आज मैं हर संवेदनशील हृदय की
एक ही पुकार लिखूँ—
“जहाँ दर्द हो, वहाँ हम हों, जहाँ आँसू हों, वहाँ हाथ हों; इंसानियत की इस धरती पर इंसान के साथ इंसान हो।” 🙏🇮🇳 जय जय भारत
जय जय हिंदुस्तान
वंदे मातरम बोलकर धरती मां का बढ़ाओ मान।
स्वरचित एवं मौलिक
✍️धर्मेंद्र कुमार राठौर
व्याख्याता भौतिक विज्ञान
झालावाड़ राजस्थान













