कान्हा… तुमसे ही तो हूँ 🦚💙
जब मन की गलियों में
खामोशी उतर आती है,
जब अपने ही सवालों में
ज़िंदगी उलझ जाती है,
तब दूर कहीं मुरली की धुन-सी
तेरी याद चली आती है, कान्हा…
तू सामने नहीं होता,
फिर भी सबसे पास लगता है,
तेरा नाम लेते ही
टूटा हुआ मन भी
फिर से विश्वास करता है।
मैंने तुझसे कभी
सुखों का सौदा नहीं किया,
बस जब भी गिरने लगी,
तेरे नाम को थाम लिया।
कभी राधा की आँखों का प्रेम,
कभी यशोदा की ममता बनकर,
कभी गीता के शब्दों में
जीवन का सत्य बनकर—
तू हर रूप में मिला है मुझे।
अब और कुछ नहीं चाहिए कान्हा,
बस इतना-सा वरदान रहे—
मेरी साँसों की अंतिम धुन भी
तेरे नाम की पहचान रहे। 💙🦚
-श्री ठाकुर
देवघर (झारखंड)













