
यह हुआ अपराध कैसा ?
आँधियों का राज़ कैसा ?
ढक गया सूरज तिमिर से
रश्मि से प्रतिवाद कैसा ?
हम नहीं जो हार जायें
मुक्ति का संगीत गायें
दूर जा कर हम क्षितिज पर
एक सवेरा ढूँढ लायें
फिर नया सूरज उगाएँ
बह रही कल कल नदी के
हो गये लोहित किनारे
शव ही,शव हैं अस्मिता के
जल रहे संझा सकारे
क्या समझ तूफ़ान ने
इस तरह हमको है डराया
मच गया उत्पात जग में
बहशियों ने यूँ सताया
देख कर साहस हमारा
पर हवाएँ थरथराएँ
आग से खेलें सदा हम
अंधड़ो को घर बुलाएँ
फिर नया सूरज उगाएँ
हम प्रयासों के सिपाही
हैं पहाड़ों के सिकंदर
ये कुल्हाड़ी है अकेली
पर प्रतिज्ञा की धुरंधर
चीर कर सीना हठी
पर्वत का चकनाचूर करके
जो उठा प्रतिरोध में
रोका उसी की राह बढ़के
आँधियों में हम अचल
पाषाण बन कर मुस्कराएँ
रात कितनी हो अँधेरी
हम दिया फिर फिर जलाएँ
फिर नया सूरज उगाएँ
के वी













