
पीढ़ी दर पीढ़ी पूर्वजों द्वारा दी गई सीख का निष्ठापूर्वक पालन करते हुए, उस रीति को अपना कर्तव्य समझकर जीते रहना ही संस्कार कहलाता आया है।
परन्तु वर्तमान पीढ़ी की बात ही और है।
यह पीढ़ी तर्क में विश्वास करती है, परन्तु उसे तर्क, वितर्क और कुतर्क के भेद का ही बोध नहीं है। बस अपने विचारों पर कोई अन्य विचार हावी न हो जाए, इस एकमात्र भाव से उपजे अहंकार में वह अपनी ही जीवन-शैली को ‘नया संस्कार’ मान बैठी है। और इसी भ्रम में वह पूर्वजों के मन को निरंतर कुंठित करने को ही अपना अधिकार और कर्तव्य दोनों समझ बैठी है।
वस्तुतः संस्कार कोई बंधन नहीं, वह तो एक प्रवाह है – जैसे नदी अपने तट नहीं छोड़ती, परन्तु बहती अवश्य है। पूर्वजों ने हमें तट दिए थे, रोकने के लिए नहीं, दिशा देने के लिए।
पहले संस्कार का अर्थ था – ‘हम क्या सीख कर जा रहे हैं’, अब इसका अर्थ हो गया है – ‘हम कैसे अपनी बात मनवा लें’।
पहले की पीढ़ी सुनती थी, फिर समझती थी, फिर तर्क करती थी। अब की पीढ़ी बिना सुने ही अपना निष्कर्ष सुना देती है। उसे लगता है – विनम्रता दासता है, और उद्दंडता स्वतंत्रता है
जबकि सत्य यह है कि –
तर्क बुद्धि को तेज करता है, पर वितर्क संबंधों को छील देता है, और कुतर्क तो जड़ों को ही काट देता है।
संस्कार विहीन तर्क, ज्ञान नहीं, केवल शोर पैदा करता है।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं कि हम पुरानी पीढ़ी की हर बात को आँख बंद करके मान लें, और न ही इस बात की है कि नई पीढ़ी अपनी हर बात को ही अंतिम सत्य मान ले। आवश्यकता सेतु की है।
संस्कार वह सेतु है जहाँ पूर्वजों का अनुभव और नई पीढ़ी की ऊर्जा एक साथ खड़े हो सकें। एक हाथ में जड़ हो, दूसरे में पंख – तभी तो वृक्ष आकाश छू पाता है।
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