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कविता

पा लिया है हमने बहुत कुछ,
मगर दौर तो खोने का चल रहा है,

साथ कारवां जुटा लिया है, मगर दौर तो परिवार खोने का चल रहा है,

नये लोग,नये रिश्ता बनाती है जिंदगी,
दौर रिश्ते खौने का चल रहा है,

नई रोशनी में चमकते रहना ठीक है,
मगर दौर तो यहां अंधेरों का चल रहा है,

सूरज की तरहां चमको,
दिन के उजाले बन कर, मगर
अफसोस मेरे यार। यहां पर

जोर रातों में जुगनू ओं का चल रहा है।।

अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)

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