
तृतीय स्वरूप
माँ चंद्रघंटा
सिंहवाहिनी माँ भवानी, महिमा तेरी न्यारी है,
भाल चंद्र की दिव्य चाँदनी, छवि अति सुखकारी है।
स्वर्णिम आभा से दमके माँ, नभ में ज्योति अपार,
दुष्ट-दलन कर भक्तों की करती हो उद्धार।
दस भुजाओं में अस्त्र सजे हैं, मुख पर तेज निराला,
घंटानाद से गूँज उठे माँ, गगन धरा चौबारा।
त्रिशूलों की ज्वाला जागे, काँपे दुष्ट-विकार,
सिंह-गर्जना से थर्राता, असुरों का संसार।
महिषासुर का दर्प मिटाकर, धर्म-ध्वजा फहराई,
देवों के सूने आँगन में, फिर से आस जगाई।
रण में चंडी, हृदय में ममता, रूप तुम्हारे अनेक,
शरणागत के शीश पर माँ, रखती करुणा-हाथ।
श्वेत कमल-सी शुचि मुस्कान, पीत-पुष्प-सी आभा,
तेरी कृपा से खिल उठती, जीवन की हर शाखा।
हे चंद्रघंटा! शक्ति-साधना का दीप हृदय में जले,
भय के बादल दूर हों, सुख के शतदल फिर खिलें।
डाॅ. सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार













