
ख़ुशियों में उछल कूद कर नृत्य नहीं
कर पाता हूँ तो गीत गुनगुनाता हूँ,
दिनचर्या जीवंत बनाकर रचनात्मक
दृष्टिकोण से मनोरंजन कर पाता हूँ।
चाँद सितारों के नभ में दिनकर जैसे
तारामंडल में ध्रुव प्रह्लाद अटल जैसे
चहुँ ओर घिरा हूँ उन प्यारे लोगों से
खुद को मिले असीमित प्रेम जिनसे।
सबको एक साथ ख़ुश रख पाना
तो किंचित असम्भव जैसा होता है,
सबका प्यार दुलार मिले यह तो खुद
के ख़ुश रहने पर ही निर्भर होता है।
अंतर्मन को ख़ुश रखकर जो
अनुभूति निरंतर मिलती रहती है,
वह अनुभूति स्वयं से बाहर तो
कभी कहीं नहीं मिल सकती है।
खुद की ख़ुशियों का चुनना,
ईश्वर का आभारी भी होना है,
ख़ुशियाँ पाकर अपनी ख़ुशियों
में सबको शामिल भी करना है।
ख़ुश रहना व ख़ुश रखना सुंदर
विकल्प है अपनी ही पसन्द का,
औरों को दुःख देकर, दुःख सहना
अंतिम सत्य है अपनी पसन्द का।
सोच सरल हो, अच्छे विचार हों,
मानवता धर्म पालन का उसूल हो,
आदित्य यह सब अच्छे सद्गुण हैं,
इन राहों चलकर पूर्ण अमल हो।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ













