
(३)
या देवी सर्वभूतेषु मां चन्द्रघंटा रूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
।।मां चन्द्रघंटा की वन्दना (आरती)।।
सर्वचिंता हुई लुप्त मांचंद्रघंटा मनमंदिर जब आई।
अलौकिक रूप ,चन्द्र की सर्वकला तुझ में समाई ।
सूर्य की दिव्य रश्मियों से आलौकित तूं महामाई ।
सर्वचिंता हुई लुप्त – – – –
मधुर ध्वनि की घंटिका से अनुपमा तूं कहलाई।।
सुवासित आलोक तेरा,परमशांति जग में आई।।
सर्वचिंता हुई लुप्त- – – –
तेरे दर्शन मात्र से आसुरी कष्ट से मुक्ति है पाई।।
अनल उगलते सिंह पर देदीप्यमान् तूं महामाई।।
सर्वचिंता हुई लुप्त – – – – –
दस भुजा तूं धारिणी,दस दिशा में तूं सरसाई।
चहुंदिशा प्रताप है तेरा,नभ जल-थल तुं है समाई।
सर्वचिंता हुई लुप्त- – – – –
गदा-चक्र-त्रिशूल,ढाल-खड़ग धारिणी महामाई।
पाश-धनु-बाण से सज्जित तेरा तरकश हे!माई।
सर्वचिंता हुई लुप्त- – – –
अर्द्धचन्द्र घंटे ने मस्तक पे तिलक-सी शोभापाई
हे! मां तूं सौम्य शांतमयी सूर्य आभा तुझ में
आई।
सर्वचिंता हुई लुप्त – – – –
हम तेरे भक्त तेरे ही सदा गुण गाएं
तूं सांसारिक कष्ट नाशिनी सर्व बंधन निस्तारिणी।
भूत-प्रेत निकट न आवे,तेरा रूप है अवतारिणी।
योग-साधना सफल होवे,तूं हो आशीष कारिणी।
पाप-बंधन,भव बाधा से छूटे तूं बने जब तारिणी ।
‘ महेश’ तेरे गुण गाए, वह अनुचर तूं स्वामिनी।।
‘ मां चन्द्रघंटा ‘ को समर्पित —– वंदना
रूपी उद् गार !
महेश शर्म













