
कब तक सोए रहोगे मन,
कब तक मौन रहोगे तुम?
कब तक आँसू पीकर अपने,
दर्द को सहते रहोगे तुम?
अब अपने भीतर झाँको,
कुछ प्रश्न स्वयं से पूछो,
जो सपने बिखर गए राहों में,
उन सपनों को फिर से चुनो।
जागृति केवल आँखें खोलना,
नहीं चेतना का जागना है,
अपने भीतर छिपी शक्ति को,
पहचानकर आगे बढ़ना है।
जब अन्याय पर मन तड़पे,
जब पीड़ा पर आँखें भर आएँ,
जब किसी पर संकट आए,
अपने हाथ सहायता को जाएँ।
जब नारी अपने अस्तित्व को,
पहचान स्वयं मुस्काएगी,
जब बेड़ियों से मुक्त चेतना,
नई दिशाएँ अपनाएगी।
तब जागृति का सूरज चमकेगा,
हर आँगन उजियारा होगा,
नफ़रत की दीवारें टूटेंगी,
प्रेम ही जग का सहारा होगा।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र













