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देनदारियाँ

आज पुरानी यादों को,
यादों में ढूंढ रहा था —
यादों में अपने कर्मों को कुरेद रहा था।
कुछ अपने, कुछ ग़ैरों की साथ ढूंढ रहा था,
क्या मिला मुझे —
सारी उम्र भागकर बस अपने किए का हिसाब ढूंढ रहा था।

हमने जो किया, कुछ ज़रूरी था, कुछ बेकार था,
क्योंकि मेरे ऊपर ही सबका कुछ न कुछ उधार था।
पिता जी ने खिलाया-पिलाया,
मां के दूध का, भाई की ज़िम्मेदारी का,
और बहन की राखी का —
बस, मेरा जीवन एक देनदार था,
ऐसे कर्ज़ का,
जो कभी लिया ही नहीं,
देनदार उसका — जिसने कभी कुछ दिया ही नहीं।

अब तो लगता है जैसे जीवन ही ऋण है,
मेरी हर सांस पर किसी का नाम लिखा है।
जो दिया, वो भी किसी की उम्मीद का हिस्सा था,
जो लिया, वो भी किसी मजबूरी का किस्सा था।

पिता की डांट में प्रेम का उधार है,
मां की आंखों में आशीष का भार है।
हर रिश्ता, हर भावना, एक सौदा-सा है —
और मैं, बस देनदारियों में उलझा हुआ मनुष्य था।

कभी पत्नी का, कभी बच्चों का, कभी समाज का कर्ज़दार था,
सोचता हूँ — इस जीवन का,
अपना क्या मोल था?
आर एस लॉस्टम

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