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धीरे-धीरे चुपके से

धीरे-धीरे चुपके से
सिंदूरी लाल पूर्ण चंद्र
क्षितिज पर हुआ उदित।
संग सुगंधित पवन मंद्र
धरा ने आंखें खोली धीरे से।
निभृत निशिथ,झीना झीना
परदे सा आसमान,
प्यार की मुश्किलों से अनजान
अलसायी अभिसारिका धरा।
प्रियतम शशि ने बाहें पसारी।
प्यार का स्वरूप चांदनी
फैल गई धरा पर।
सिमटी,लाज से दोहरी हुई धरा
समा गई शशि की बाहों में।
प्रच्छन्न शांति साक्षी थी।

सुलेखा चटर्जी

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