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कविता- प्रकृति

प्रकृति की लीला कितनी न्यारी,
कहीं बरसता झमझम पानी,
नदियाँ बहती कलकल – छलछल,
और कहीं उफनाता है पानी।
जरा देखिये ये,
प्रकृति की लीला कितनी न्यारी है।।

प्रकृति का रूप निराला कभी,
कभी चलती सर- सर हवा,
तो कभी मौन हो जाती है,
जरा देखिये ये,
प्रकृति की लीला कितनी न्यारी है।।

कभी नभ लाल, नीला, पीला हो जाता है,
तो कभी काले- सफेद बदलो से घिर जाता है,
जरा देखिये ये,
ये प्रकृति की लीला कितनी न्यारी है।।

कभी सूरज अपनी किरणों से जग रोशन करता है,
तो कभी रात के अंधेरे में चाँद, तारे टीम- तिमाते है,
जरा देखिये ये,
प्रकृति की लीला कितनी न्यारी है।।

कभी सुखी धरती धूल उड़ती है,
तो कभी हरियाली की चादर ओड लेती है,
जरा देखिये ये,
प्रकृति की लीला कितनी न्यारी है।।

कहीं सूरज बदलो में छिपता है,
तो कहीं निकल कर चौका देता है,
जरा देखिये ये,
प्रकृति की लीला कितनी न्यारी है।।


नंदकिशोर गौतम
(माध्यमिक शिक्षक)
शास. उच्च. माध्य. विद्यालय बकोडी, जिला सिवनी (म.प्र.)

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