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मुट्ठी भर आकाश

पथ ढूंढती है आज भी स्त्रीमन
होकर अपने में ग़ुम, उन्मन।
अपने आप को कोशिश की ढूंढने की,
सम्मुख असुर आए, लहूलुहान कर गए।
” नम्र बनो, सर झुका कर चलो”
बड़े बूढ़ों की सीख थी, आज स्त्री सोचती,
क्या वह सही थी??
तकनीक नए जमाने का है, फिर मेरा चलन
क्यों पुराने जमाने का है?
क्यों पुरुष कभी सर नहीं झुकाता है,?
मनमानी करना क्यों उसे भाता है?
कदाचित अहंकार सामने आता है!!!!
सही रास्ते चलकर ज्ञान अर्जन करना
मुझे भी आता है, पूरा करना ही है अभिलाष।
सिर्फ कोशिश इतनी है,मुझे चाहिए,
सुदृढ़ ज्ञान, स्वाभिमान और एक मुट्ठी आकाश।

सुलेखा चटर्जी

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