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खुशियों की चाबी


विधा-काव्य

इंसानी मन के सन्दुक मे खुशियाँ समायी होती है
जीवन जीने की एक लालसा दिखाई देती है

इस सन्दुक मे आपकी सोच का ताला होता है
निराशा हताशा का पर्याप्त दिमागी मसाला होता है

सोच के ताले की चाबी आपकी अपनी महत्वाकांक्षा होती है
बुलंद इच्छाओं के वजूद से खुशियाँ कभी ताले मे कैद नही होती है

अच्छी महत्वाकांक्षाओं से आपकी खुशियों का ताला खुलता है
जीवन को खुशियों के रंगों मे पिरोकर जीने का एक सलीका मिलता है

रब ने तो सब अच्छा किया मानकर एक सही दिशा मे जीवन को ले जाने का सक्रिय एक रास्ता मिलता है
कर्म और नेक सोच को घोल बनाकर पीने से दिन का हर वक़्त उजाला मिलता है

अपनी मन के सन्दुक को सदैव खुला रखना चाहिये
सोच रूपी ताले को एक तरफ फेंक देना चाहिये

उंची महत्वाकांक्षाओं की चाबी से खुशियों का संसार चमन करना चाहिये
इसीलिये खुशियों की चाबी सदैव ही अपने कुर्ते से गांठ बांधकर रखना चाहिये

स्वरचित एवं मौलिक
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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