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दो दशकों का हमसफर

“वो साल पुराने थे मगर साथ आज भी नया है,
तुम्हारी सादगी में ही मेरा सारा जहां बसा है।”

इन बीस सालों में हमने सिर्फ कैलेंडर की तारीखें नहीं बदलीं, बल्कि साथ मिलकर एक पूरी दुनिया बुनी है। मेरी उम्र के इन चालीस वर्षों में से सबसे कीमती वो लम्हें हैं, जिनमें तुम्हारा साथ शामिल रहा। शुक्रिया, मेरी अधूरी बातों को समझने के लिए और मुझे ‘मैं’ बने रहने देने के लिए।”

चालीस की दहलीज पर खड़ी, पीछे मुड़कर देखती हूँ,
बीस बरसों की यादों को, पलकों में समेटती हूँ।
आधी उम्र गुज़ारी है मैंने, बस तेरे ही साये में,
खुशियाँ अपनी ढूँढ ली मैंने, तेरी वफ़ा के सरमाये में।
ये सफर यूँ ही चलता रहे, जैसे महकती कोई कली,
दुआ है कि हर जनम में मुझे, तेरी ही ये राह मिली।
नसीब की लकीरों में लिखा, तेरा-मेरा ये प्यारा साथ,
सुकून मिलता है यारा जब थामते हो तुम हाथ।

चालीस की इस उम्र ने, तजुर्बों का एक जहां दिया,
पर उन बीस सालों ने मेरी रूह को मुकम्मल आसमां दिया।
आधी उम्र के इस पड़ाव पर, जब पीछे मुड़कर देखा मैंने,
तुम्हारे साथ बिताया हर लम्हा, ज़िंदगी का सबसे हसीं कारवां दिया।
वो कच्ची उम्र की बातें, वो शुरूआती मुलाक़ातें,
अब बीस बरस पुरानी, महकती यादें बन गईं।
तकरार में छिपी फिक्र, और खामोश वो जज्बात,
वक्त की आंच में तपकर, अटूट फौलाद बन गईं।
कभी धूप चढ़ी, कभी शाम ढली, पर तुम साथ खड़े रहे,
मेरे हर छोटे-बड़े ख्वाब में, तुम रंग भरते रहे।
ये बीस साल महज़ गिनती नहीं, मेरी हस्ती का हिस्सा हैं,
जैसे खुली किताब के, सबसे खूबसूरत कोई किस्सा हैं।
ज़िंदगी की शाम तक, बस यही साथ बना रहे,
हमारे दरमियां वफ़ा का, ये पाक रिश्ता सजा रहे।
मुकम्मल है मेरी हस्ती, तुम्हारे साये के तले,
पाकर तुम्हें ऐ हमसफ़र, ‘रजनी’ को अपना जहां मिला।

रजनी कुमारी
लखनऊ उत्तर प्रदेश

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