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परम तत्व: प्रेम

प्रेम ही प्रतिलिपि मेरी, प्रेम ही अनंत विचार,
प्रेम के भूखा मैं दर-दर भटका, प्रेम तो पूरा संसार।

अंतर के शून्य गगन में, जब शब्द हुए लाचार,
एक धड़कन ने धीमे से कहा — प्रेम ही असली सार।

राहों में धूल बहुत थी, आँखों में स्वप्न अपार,
हर चेहरे में ढूँढा उसको, हर साये में उसका आकार।

मंदिर-मंदिर में खोजा, पर्वत, सागर, द्वार-द्वार,
जब थक कर बैठा खुद में, मिला वही सच्चा प्यार।

न कोई बंधन, न कोई सीमा, न कोई दीवार,
प्रेम ही जीवन की ज्योति, प्रेम ही परमाधार।

अब न भटकन, न कोई प्यास, न कोई और पुकार,
प्रेम ही प्रतिलिपि मेरी, प्रेम ही अनंत विचार।
आर एस लॉस्टम

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