
वो दौर भी एक दौर था
इश्क का एक बेगज़ब जोर था
झलक उसकी एक पाने की ही हर वक़त खुमारी थी
साईकिल मेरी उसकी लूना की सवारी थी
साईकिल भी मेरी उसकी लूना के बराबर भागती थी
मानों उसकी एक झलक की कसक मेरे ही नही मेरी साईकिल के दिल मे भी जागती थी
ख्वाब था कि एक दिन वो मेरी साईकिल मे बैठ दूर वादियों का नज़ारा लेगी
झुकी झुकी नज़रों से ही वो मुझे अपने प्यार का एक मीठा सा इशारा देगी
आज मेरी साईकिल साथ मेरे अब नही है
अरमाँ भी साथ के उसके अब रूह मे नही है
बेगज़ब वो जमाना हुआ करता था
चिट्ठी पत्री से ही भावनाओं का आदान प्रदान हुआ करता था।
सादगी का वो एक अदभुत नज़ारा था
प्यार से भी प्यारा वो यार हमारा था
मोबाइल बाइक कैश देखकर साथी नही बनते थे
साईकिल पर चलनेवाले और बैठने वाले की सादगी पर ही मर मिटते थे
वो था प्यार जो आज पूंजी की चमक तले कहीं खो गया
अपने तो अपने हमसाया भी आज पराया सा हो गया
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र













