
बांग्लादेश की 13वीं राष्ट्रीय संसद के चुनाव नतीजों ने देश की राजनीति को नई दिशा दे दी है। सत्रह साल बाद वतन लौटे तारिक रहमान न सिर्फ चुनाव के नायक बनकर उभरे, बल्कि शपथ लेकर नए प्रधानमंत्री के रूप में सियासी पुनर्जन्म की मिसाल भी पेश कर दी। उनकी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने 297 में से 209 सीटें अपने दम पर जीतीं, जबकि उसके नेतृत्व वाले गठबंधन को कुल 211 सीटें मिलीं। यह स्पष्ट जनादेश है—स्थिर सरकार और नई राजनीतिक शुरुआत के लिए।
सत्ता परिवर्तन की औपचारिकता पूरी मंगलवार सुबह संसद परिसर के साउथ प्लाजा में नवनिर्वाचित सांसदों को मुख्य चुनाव आयुक्त एएमएम नासिर उद्दीन ने शपथ दिलाई। इसके साथ ही महीनों से जारी राजनीतिक अनिश्चितता पर विराम लगा। शपथ ग्रहण समारोह में कई देशों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। भारत की ओर से लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भाग लेकर द्विपक्षीय रिश्तों के महत्व को रेखांकित किया।
जमात की जोरदार वापसी चुनाव परिणामों का दूसरा बड़ा संदेश बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी की वापसी है। 1941 में अबुल आला मौदूदी द्वारा स्थापित इस दल का इतिहास विवादों से घिरा रहा है, खासकर 1971 की मुक्ति जंग के संदर्भ में। बांग्लादेश बनने के बाद शेख मुजीबुर रहमान ने इस पर प्रतिबंध लगाया था। बाद में राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव के साथ यह प्रतिबंध हटता और लगता रहा।
इस चुनाव में जमात ने 11 दलों के गठबंधन के साथ उतरकर 77 सीटें जीतीं, जिनमें से 68 सीटें उसने खुद हासिल कीं। यह उसका अब तक का सबसे मजबूत प्रदर्शन है। साफ है कि पार्टी ने न केवल वापसी की है, बल्कि विपक्ष की प्रमुख शक्ति बनकर उभरी है।
शेख हसीना के लिए राहत की वजह पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और उनकी पार्टी आवामी लीग को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं मिली। 2024 के छात्र आंदोलन और सत्ता परिवर्तन के बाद यह उनके राजनीतिक अध्याय का अचानक अंत जैसा था। हालांकि, नतीजों में उनके लिए एक सियासी राहत यह है कि सत्ता सीधे जमात के हाथ में नहीं गई। अवामी लीग और जमात के बीच दशकों पुरानी वैचारिक प्रतिद्वंद्विता रही है।
छात्र राजनीति की एंट्री: NCP 2024 के सत्ता-विरोधी छात्र उभार से जन्मी नेशनल सिटिजन पार्टी (NCP) ने पहली बार चुनावी मैदान में कदम रखा। नाहिद इस्लाम और हसनात अब्दुल्ला जैसे युवा चेहरों ने जीत दर्ज की। पार्टी ने जमात गठबंधन के तहत 30 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, जिनमें से 6 पर सफलता मिली। भले ही संख्या कम हो, पर संसद में युवाओं की आवाज़ अब औपचारिक रूप से मौजूद है।
आगे की राह इन नतीजों ने बांग्लादेश की राजनीति को बहुध्रुवीय बना दिया है। बीएनपी के पास स्पष्ट जनादेश है, जमात मजबूत विपक्ष के रूप में स्थापित है, और छात्र राजनीति संसद तक पहुंच चुकी है। अवामी लीग की अनुपस्थिति ने राजनीतिक संतुलन को नया रूप दिया है।
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान आर्थिक स्थिरता, सामाजिक सद्भाव और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के मोर्चे पर क्या दिशा तय करते हैं। बांग्लादेश एक नए राजनीतिक अध्याय में प्रवेश कर चुका है—जहां जीत केवल एक दल की नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की भी है।
कृष्णा कान्त कपासिया













