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समान कानून__सिविल संहिता

ईश्वर ने एकात्म दृष्टि से,
मानव का निमार्ण किया।
सभी जनों को एक भाव से,
यथा_उचित ,अनुदान दिया।।

हवा चल रही सदा_सदा से,
सबको वह मिल जाती है।
कोई बोए, कोई काटे,
धरती फसल उगाती है।।

सूरज अंतर कभी नहीं,
करता प्रकाश फैलाने मे।
बिल्कुल भेद नहीं करता है,
मेघ नीर बरसाने मे।।

बिना भेद हर छांव पथिक के,
तन की थकन मिटाती है।
कुटिया हो या रंग महल हो,
धूप,चांदनी आती है।।

कुआं, बावली, नदी, सरोवर,
कोई भेद नहीं करते।
सिंधु लहर है भेद रहित,
फल, फूल, वृक्ष , फलते, खिलते।।

एक भूमि, आकाश एक है,
एक ग्रीष्म है सावन है।
एक जगत, जगदीश एक है,
सृष्टि चक्र अति पावन है।।

एक जगत, जगदीश एक है,,
फिर यह भेद_भाव कैसा ?
पंथ, जाति, मजहब का सारा,
फिर यह दुष्प्रभाव कैसा ?

रही सदा से समता वादी,
सनातनी संस्कृति धारा।
मिलकर रहे हमेशा मंदिर,
मस्जिद, गिरजा , गुरुद्वारा।।

फिर इसमें क्या, ऊंचनीच, सब अपने कौन पराया है ? आपस मे लड़नेमरने का,
जहर कहां से आया है ?

कौन अल्प संख्यक, बहु संख्यक,
कौन खरा या खोटा है ?
कहने को जब सभी एक फिर,
कौन बड़ा या छोटा है ?

अगड़े, पिछड़े, दलित न कोई,
ना ही आदीवासी हैं।
सब भारत के रहने वाले,
सब ही भारत वासी हैं।।

हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई,
यदि सब भाई_भाई हैं।
फिर इन घृणित हरकतों की,
क्यों इतनी गहरी खाई है ?

जाति, पंथ, की अलग_अलग,
सुविधाएं हमे लड़ाती हैं।
भारत माता के सीने मे,
मानो छुरी चुभाती हैं।।

भारत मां अपने बेटों से,
कोई भेद नहीं करती।
लेकिन स्वार्थ वृत्ति के चलते,
उसकी दाल नहीं गलती।।

अगड़े, पिछड़े, दलित वाद ने,
भारत मां को उलझाया।
वोट बैंक की कुटिल नीति ने,
भाई_भाई लड़वाया।।

पहले ही हम बटवारे की,
घोर त्रासदी झेल चुके।
सत्ता के मद के मतवाले,
खेल घिनौना खेल चुके।।

बहुत चल गई तुष्टिकरण की,
चाल न अब चलने देगें।
राष्ट्र एक है, सभी एक हम,
खंड न अब करने देगें।।

जाति, पंथ, मजहब आधारित,
सारे झगड़े बंद करो।
सभी नागरिक एक बराबर,
यह आवाज बुलन्द करो।।

देश एक कानून एक हो,
एक समान नागरिकता।
बदलो बहु विधान, लागू कर,
संवैधानिक_ समरसता।।

डा शिव शरण श्रीवास्तव ‘अमल’
बिलासपुर छत्तीसगढ़

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