श्रीनिम्बार्क सत्संग – नई दिल्लीनई दिल्ली में आयोजित श्रीनिम्बार्क सत्संग के पावन अवसर पर स्वदेशी चेतना, सांस्कृतिक संरक्षण एवं राष्ट्रीय आत्मनिर्भरता पर विशेष उद्बोधन प्रस्तुत किया गया।

इस अवसर पर परम पूज्य
श्रीमद् जगद्गुरु निम्बार्काचार्य विद्यावारिधि अतुल कुमार मिश्र जी महाराज
पीठाधीश्वर – श्रीनिम्बार्क पीठ
संरक्षक – श्रीनिम्बार्क सेवा संस्थान अमेठी (SNSS Amethi)
के प्रेरक संदेश का वाचन एवं प्रसारण किया गया।
मुख्य संदेश
“विदेशी नस्ल की जर्सी गाय एवं कुत्ता, विदेशी टट्टू से देशी रसभ उत्तम उपयोगी।
पालने से वह समय पर आपकी सुरक्षा नहीं करते, आपको उनकी देखभाल में अपने जीवन का महत्वपूर्ण समय एवं धन अपव्यय करना पड़ता है।
इसलिए देशी प्रजाति की सुरभि एवं श्वान कल्याणकारी हैं।”
उद्बोधन के प्रमुख बिंदु
1️⃣ देशी गौवंश (सुरभि) का महत्व
देशी गाय भारतीय कृषि, गो-आधारित अर्थव्यवस्था, आयुर्वेद, पंचगव्य चिकित्सा एवं पर्यावरण संरक्षण की आधारशिला है। इनका पालन केवल आर्थिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
2️⃣ देशी श्वान की उपयोगिता
देशी श्वान स्थानीय परिस्थितियों में अनुकूलित, अधिक सजग एवं सुरक्षा के दृष्टिकोण से विश्वसनीय होते हैं। वे कम संसाधनों में भी बेहतर स्वास्थ्य एवं कार्यक्षमता बनाए रखते हैं।
3️⃣ विदेशी नस्लों पर अत्यधिक निर्भरता के दुष्परिणाम
विदेशी नस्लों की देखभाल में अधिक धन, समय एवं संसाधनों की आवश्यकता होती है। कई बार वे स्थानीय जलवायु एवं परिवेश के अनुरूप स्वयं को ढाल नहीं पाते, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ता है।
4️⃣ सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
स्वदेशी प्रजातियों का संरक्षण भारतीय परंपरा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था एवं आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को सशक्त करता है। यह भावना भारतीय संस्कृति मंत्रालय के सांस्कृतिक संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्यों के अनुरूप है।
समाज के लिए आह्वान
सत्संग में उपस्थित श्रद्धालुओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं एवं युवाओं से देशी नस्लों के संरक्षण एवं संवर्धन का संकल्प लेने का आह्वान किया गया।
स्वदेशी अपनाएँ – संस्कृति बचाएँ – राष्ट्र सशक्त बनाएँ
आयोजन स्थल : नई दिल्ली
जारीकर्ता : श्रीनिम्बार्क सेवा संस्थान अमेठी SNSS Amethi
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