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मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम

   रूप अनेक धरे तुमने,
    पर सबसे मोहक रूप--
   दशरथ नंदन बन तुम आए,
     हृदय बसहु सुर भूप।

    भारत भूमि धन्य हुई है,
     अवतरित हुए जो तुम।
     धर्म संस्कार प्रेरक हो तुम,
      अब सद्धर्म ना होंगे गुम।

      गृहस्थ धर्म का हो पालन,
       नियम नीति,सदकर्म के संग,
       परउपकार की शिक्षा भी दी,
        जीवन में भरे अनेकों रंग।

         अन्याय अधर्म असह्य था,
         प्रतिकार करना सिखलाया।
          सत्य के पथ का रक्षक धर्म,
           यह भी जग को बतलाया।

           आज समस्त विश्व नतमस्तक,
             यही तो है आशीष तुम्हारा।
             कलयुग केवल नाम अधारा,
            सुमिर सुमिर नर उतरही पारा।

        यह वर मांगहु कृपा निकेता, 
         बसहूं हृदय श्री अनुज समेता।
                   सुलेखा चटर्जी

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