
एक छोटी सी गोरैया रोज मेरे घर आती।
उसकी मीठी आवाज मेरे कानों में मिश्री घोल जाती।
वह सुंदर से मुंह से चहक-चहक अपना हाल सुनाती।
वह कभी फुदक कर मेरे पास आती।
कभी डर कर मुझसे दूर भाग जाती।
रोज सुबह वह दाना चुगने मेरे घर आती।
फिर वह दूर आसमान में उड़ जाती।
दिन भर आसमान में अपने साथियों संग होड़ लगाती।
शाम ढले फिर वह मेरे छत पर आती।
वहां मुंडेर पर बैठ मुझे देख अपनी चोंच हिलाती।
दिन भर की थकान उतारने वह पानी के सकोरे में उतर जाती।
फिर वह मजे से उस सकोरे में नहाती।
उसे यूं अठखेलियां करते देख मेरे मन में खुशी की लहर दौड़ जाती।
अंत में वह अपने घोंसले में लौटने के लिए ऊंची उड़ान भर आसमान में उड़ जाती।
संजना पोरवाल












