
लेकर हाथ कनक पिचकारी |
होली खेलें कृष्ण मुरारी ||
झूम-झूम कर नाचे राधा,
निरखें सखियाँ बारी-बारी ||
लेकर हाथ कनक पिचकारी ||
मिटी सभी आपस की दूरी।
हुई कामना सबकी वी पूरी।
रँग खुशी के बिखर रहे हैं,
मिली प्रेम की है कस्तूरी।
लगे न युवती आज कुँवारी |
लेकर हाथ कनक पिचकारी ||
आज शत्रु भी लगता भाई।
होली ने दुश्मनी मिटाई ।
पढ़ते आज सभी मिल मानो,
सधे प्रेम के अक्षर ढाई।
मन भाए हैं। हृदय बिहारी |
लेकर हाथ कनक पिचकारी ||
फूला टेसू भी इतराये |
रंगों का मतलब समझाये।
मन भाती फूलों की होली ,
रंग – रसायन हमें न भाये।
गारी आज लगे अति प्यारी |
लेकर हाथ कनक पिचकारी ||
फागुन बौरा कर ज्यों आया |
रंग प्यार के अद्भुत लाया ||
ढोल – मृदंग चंग सब बाजें,
सबका हृदय देख हर्षाया।
मिलता है “संतोष” सभी को,
आज उड़ेलो मस्ती सारी ||
लेकर हाथ कनक पिचकारी |
रँग खेल रहे कृष्ण मुरारी ||
संतोष नेमा “संतोष”












