बरसाने की गलियों में आज,
रंग नहीं-मिठास उड़ी है,
राधा रानी के आँगन में,
प्रेम की वर्षा की झड़ी है।
लाल-गुलाबी बादल छाप,
ढोल मृदङ्ग बजाए टोली,
हँसते-गाते ब्रजवासी खेले,
आज निराली होली है।
लड्डू उड़ें अंबर की ओर,
जैसे स्नेह के हो फूल,
जिसे लगे वह धन्य हो जाये,
मिट जाए मन का शूल।
श्याम नाम की गूँज में डूबी,
हर गली, हर द्वार,
राधे-राधे रटते सब मिल,
बरसाएं प्रेम अपार।
ब्रज की लड्डूमार होली में,
रंग नहीं बस प्यार,
मिठास भरी हर बूंद यहाँ,
राधा-श्याम का है उपहार।।
डॉ पल्लवी सिंह 'अनुमेहा'
लेखिका एवं कवयित्री
बैतूल, मध्यप्रदेश