
फागुन मे आवत होली का त्यौहार
केशर उड़त अबीर गुलाल हर चौबारे हर द्वार
रंग चढ़त हर तन मौसम मे भाये बहार
भौजाई संगे होली खेलत देवर हर बार
फागुन मे आवत होली का त्यौहार
गुजिया सलौनी मठरी मिठाई से हो अपनो का सत्कार
हर द्वारे मिलन हो रंगों का संसार
बैठ चौबारे सबरे संगे सुनावे फागुनवा के गीत झंकार
ढोल के थाप से नाचे बचपन्वा हमार
उमंग उल्लास से सराबोर होवत हर मन तन श्रंगार
पिचकारी से भिगोवत होए तन मन हमार
नैनो मे संजोते हमरे सपने हज़ार
भूले के भैया सबरे गिले शिकवे बरस जात प्यार ही प्यार
ऐसे मनत भैया हमरे गावों को त्यौहार
केशर उड़त अबीर गुलाल हर चौबारे हर द्वार
फागुन मे आवत होली का त्यौहार
स्वरचित एवं मौलिक
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र










