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हिन्दू अधर्म से डरते हैं |

हिन्दू अधर्म से डरते हैं |
वे सोच सुपावन रखते हैं ||
यह देश सभी धर्मों का है |
सम्मान सभी का करते हैं ||

जिसको सिंदूर डराता है |
शुभ तिलक न जिसको भाता है ||
अनभिज्ञ कलावा से हैं जो |
संकीर्ण हृदय कहलाता है ||
जिनका मजहब कट्टरता है |
वे बैर गैर से रखते हैं ||
हिन्दू अधर्म से डरते हैं |

जो शंखनाद से घबराएँ |
जो गूंज ओम की ठुकराएँ ||
जिनको विद्वेष सनातन से |
जो संघ शक्ति पर तन जाएँ ||
मानवता के दुश्मन हैं वो |
जो गलत इरादे रखते हैं ||
हिन्दू अधर्म से डरते हैं |

जो उल्टे नियम चलाते हैं |
चिन्हों पर रोक लगाते हैं ||
उनको संज्ञान नहीं जिसकी,
जड़ गहरी वेद बताते हैं ||
वसुधैव कुटुंब हमारा है |
हम दुष्कर पथ पर चलते हैं ||
हिन्दू अधर्म से डरते हैं |

जो शिखा सूत्र से चिढ़ जाते |
होली के रंग नहीं भाते ||
समरसता से जो दूर रहें |
वे शत्रु अमन के कहलाते ||
‘संतोष’ सदा सौहार्द रखें |
जिससे सद्भाव पनपते हैं ||

हिन्दू अधर्म से डरते हैं |

संतोष नेमा “संतोष”

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