
विषय- दर्द
विधा- कविता
शीर्षक- तो ही मैं फिर समझूँगी
मेरे इस कुछ पल लिखने से,
गर कोई सुकूँ को पाता है।
इन्हे पढ़कर अगर कोई,
फिर से जी जाता है।
तो ही मैं फिर समझूँगी,
हाँ मुझको लिखना आता है।
मेरा हर शब्द कविता है।
दुःख दर्द बहुत हैं दुनिया में,
बस इनको कम करने की,
छोटी सी मरहम मैं बन सकू।
किसी के मन को सुकूँ मैं दे सकू,
किसी के दिल को चैन मैं दे सकू
मैं तो बहती नदियाँ की धारा हूँ,
मानो मन को निर्मल मैं करती हूँ
छल, दम्भ, द्वेष कभी मेरे,
पास नहीं ये टिकता है।
इर्ष्या और जलन का भाव,
छूते ही मुझको जलता है।
दुनिया के कुछ लोगो को अगर,
मेरी ये बातें बहलाती हैं।
सच मानों दुनिया के लिए,
ये मेरी लिखी एक पाती है।
गृहस्थ तपोवन में तू रहकर,
प्रेम पूर्ण कर्तव्य निभाकर।
मर्यादाओं को साथ में लेकर
निश्छल कर्म प्रधान बस बने रहो
अगर तुम्हें लगे ये बात सही,
शब्दों में जो मैंने कही।
कहते हैं कविता कोई शब्द नहीं,
ये तो भावों का मेला है।
लेकिन मेरे कुछ शब्दों से,
गर कोई सुकूँ को पाता है।
तो ही मैं फिर समझूँगी,
हाँ मुझको लिखना आता है।
मेरा हर शब्द कविता है।
मेरा हर शब्द कविता है।
रचनाकार- श्रीमती सुनीता बोपचे सिवनी (म प्र)












