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सिंह कन्ध जो श्याम सलोने हैं

सिया, राम- लक्ष्मण संग वन में
चलते थक कर विश्राम कर रहे थे,
वटवृक्ष तले शीतल छाया में बैठे,
रघुबीर अगले पथ के चिंतन में थे।

ललनायें कहतीं धन्य हुई हैं वे सब,
सिया, राम, लक्ष्मण के दर्शन कर,
पीटवस्त्र में बिन आभूषण माँ सीता
तेज़कांति अति दिव्य ज्योति पाकर।

कैसे वनवास दियो इनको सखि,
नैनन बीच जो तीनों बस जावे हैं,
श्याम सलोने, गोर बदन भाई द्वौ,
सुकुमारि सलोनी नारि लुभावें हैं।

नृप नारि निर्दयी भयो कत इन पै,
केहि कारज हिया से इनहिं दुरावे है,
महलों बिच जे जन्में औ पले पोषे हैं,
वन वन क्यों भटकें ये कोई बतावे है।

सियहिं देखि जिज्ञासु,
निज आयसु प्रभु दीन्ह।
आलिन संग मिलि सीता,
आपुहिं परिचित कींह ॥

गौर अंग तर्कस काँधे पर जिनके,
लक्ष्मण नाम, वे लघु देवर हैं मेरे,
सिंह कन्ध हैं श्याम सलोने जो,
नैन तिरीछे करि कहा स्वामी मेरे।

चक्रवर्ति नृप दशरथ अयोध्या के,
दोऊ सुत हैं उनके, मैं जनकसुता हूँ,
मात-पिता आदेश पालने आये हैं,
असुर विहीन धरा ये करने आये हैं।

वन वन के आश्रम सन्त दरश कर,
उनकी सुरक्षा करने यहाँ आये हैं,
आदित्य सिया राम लखन का यह
परिचय पाकर गद्गद सब नरनारी हैं।

डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ

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