
कितना सुंदर मंजर था, कितने हसीन वो पल थे,
कल की फिक्र से दूर, खुशियों के कुछ कल थे।
बड़ी मशक्कत से माँगा था परिवार से घूमने का अधिकार,
भागदौड़ से चुराए पलों में, बस रहा था एक संसार।
हौले-हौले लहरों पर कश्ती अपनी चल रही थी,
कोई रील बना रहा था, कोई यादें बुन रही थी।
पर किसे पता था उस पल, कि लहरें यूँ मचलेगी,
चंद लम्हों की खुशी, ताउम्र का गम बन जाएगी।
अचानक मौसम बदला, और छाई काली परछाई,
चीख-पुकार के बीच बस मौत ही नजर आई।
बरगी की उन लहरों ने, कई आशियाने उजाड़ दिए,
हँसते-खेलते चेहरों को, बेबसी के मोड़ पर छोड़ दिए।
उस माँ की ममता देखो, जो मौत से भी टकराई,
अपने लाल को सीने से लगा, आखिरी साँस तक लड़ाई।
लहरों ने जिस्म जुदा किए, पर ममता का बंधन न टूटा,
सफर तो अधूरा रहा, पर रूह से वो रिश्ता न छूटा।
वक्त की उस भूल ने, नौ जिंदगियाँ छीन लीं,
खुशियों की वो रील, अब बस एक दर्द भरी याद बनी।
लापरवाही की उस लहर ने, कैसा ये सितम ढाया,
पूरा शहर आज रोता है, जिसने अपनों को गँवाया।
कवयित्री ज्योति वर्णवाल
शत -शत नमन उन आत्माओं को











