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जिंदगी की डगर

जिंदगी है एक सफर
इस डगर न जाने कल क्या हो
इस अनजान सफर
वक्त का नहीं भरोसा
मन में तेरे तूफां उठा
न जाने ले जाए किधर
संगी मिले या छूटें
मन में कुछ करने की प्रतिज्ञा ली है अगर
मन के मीत मिले या छूट कर न चले जाएं किधर
तूं वक्त को थोड़ा पढ ले
सोच कर फिर से बढता जा अपने सफर
जिंदगी है एक पहेली
ये पहली ही बताएगी रास्ता
जब चांद निकलेगा
रात के अंधेरे में भी ढूंढ लेगा अपनी डगर
अंधड आएं या खाईयां
दूर चमकता ध्रुव तारा
दिशासूचक बन कर आसां बना देगा सफर
ग्रह नक्षत्र अनादि हैं
इन को पढ कर न जाने कितने बढ़े अपने सफर
ये सफर सुहाना होगा
मलय की हवा और शीतल झरने
उन्हें ही मिले हैं
मरुस्थल की भू पर भी फूल राह में खिले हैं
उस नियंता का काल भी देगा राहें
नियति में नहीं कोई होगा झोल
आगे बढ और नियति के पट खोल
एक दिन शिखर पर तूं होगा
तेरी कामयाबी
तेरी किस्मत में होगी
वक्त आएगा और… बजेंगे ढोल ।

   महेश शर्मा, करनाल

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