
मन का एक कोना खाली
आज भी संजोकर रखती हूं।
कहीं भर ना जाए वह कोना
आज भी कोशिश करती हूं।
यादों का पुराना संदूक सा वह
हर बार ख्यालों में रहता है ।
मिलती जीने की प्रेरणा अक्सर
आगे बढ़ने को अग्रसर करता है।
जीवन की इस आपाधापी में
वक्त जाने कब गुजरता है ।
रहती हर वक्त मायूसी चेहरे पर
दिन जाने कब ढलता है।
सुखद यादों का संदूक पुराना
झांकने को जब भी मिलता है ।
चुरा लेती हूं थोड़ी सी फुर्सत
सुकून भरा चेहरा मुस्कुराता है।
स्वरचित :- उर्मिला ढौंडियाल ‘उर्मि’
देहरादून (उत्तराखंड)













