
समझ सबमे है समझदारी नही आती
मुद्दों की बात समझ नही आती
एक तरफा प्रेम कभी सफल नही होता
ये बात किसी के समझ क्यों नही आती
समझ सबमे है समझदारी नही आती
सच बोलनेवाला ही दुनियाँ मे बुरा है
सारी लान्छनों का जिम्मेदार एकलौता वो सुरा है
छदम प्रेम पर ही दुनियाँ आज भी क्यों डूबती इतराती
समझ सबमे है समझदारी नही आती
हकीकत का आइना ही क्यों खराब होता है
ये कैसी नियामत कि इन्सान क्यों नवाब होता है
सच से रुबरू होने की हैसियत क्यों इन्सान मे नही आती
समझ सबमे है समझदारी नही आती
दुनियादारी सब सिखाते दुनियां से दूर क्यों जाते है
खुद की बजाये सारे एब दुनियाँ मे ही क्यों पाते है
इंसानी फितरत है दुनियाँ ही बुरी नज़र आती
समझ सबमे है समझदारी नही आती
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र












